🏹 भील जनजाति
राजस्थान की सबसे प्राचीन एवं पराक्रमी जनजाति
📍 निवास स्थान: मुख्य रूप से उदयपुर का भौमट क्षेत्र। सर्वाधिक जनसंख्या बांसवाड़ा जिले में है।
🔎 नाम का अर्थ: द्रविड़ शब्द ‘बील’ से बना है, जिसका अर्थ है कमान (Bow)।
🔎 नाम का अर्थ: द्रविड़ शब्द ‘बील’ से बना है, जिसका अर्थ है कमान (Bow)।
📜 इतिहास में उल्लेख
- कर्नल जेम्स टॉड: भीलों को “वनपुत्र” की संज्ञा दी।
- टॉलमी: इन्होंने भीलों को “फिलाइट” (तीरंदाज) कहा।
- विशेषता: यह राजस्थान की सबसे प्राचीन जनजाति मानी जाती है।
🏠 घर और ग्रामीण व्यवस्था
- कू / टापरा: भीलों के घर को कहा जाता है।
- फला: झोपड़ियों के छोटे समूह (मोहल्ला)।
- पाल: भीलों का बड़ा गाँव।
- गमेती / पालती: गाँव का मुखिया।
👕 वेशभूषा (पहनावा)
| वस्त्र का नाम | विवरण |
|---|---|
| ठेपाडा / ढेपाडा | पुरुषों द्वारा पहनी जाने वाली तंग धोती। |
| खोयतू | भील पुरुषों की लंगोटी। |
| पोत्या | सिर पर बांधा जाने वाला सफेद साफा। |
| पिरिया | भील दुल्हन की पीले रंग की साड़ी। |
| सिंदूरी | दुल्हन की लाल रंग की साड़ी। |
| कछावू | भील महिलाओं का लाल और काले रंग का घाघरा। |
💃 लोक संस्कृति एवं नृत्य
- प्रमुख नृत्य: गवरी, राई, गैर, ढिचकी, हाथीमना और घुमरा।
- लोकगीत: सुवंटिया (स्त्रियों द्वारा विरह में), हमसीढ़ो (स्त्री-पुरुष युगल गीत)।
🎡 प्रमुख मेले
1. बेणेश्वर मेला (डूंगरपुर): माघ पूर्णिमा पर सोम-माही-जाखम के संगम पर।
2. घोटिया अंबा मेला (बांसवाड़ा): चैत्र अमावस्या पर। इसे “भीलों का कुंभ” कहा जाता है।
2. घोटिया अंबा मेला (बांसवाड़ा): चैत्र अमावस्या पर। इसे “भीलों का कुंभ” कहा जाता है।
🙏 धार्मिक मान्यताएँ
- कुल देवता: टोटम देव।
- कुल देवी: आमजा माता / केलड़ा माता (केलवाड़ा, उदयपुर)।
- शपथ: केसरिया नाथ जी (ऋषभदेव) का केसर का पानी पीकर भील कभी झूठ नहीं बोलते।
- भराड़ी: विवाह के अवसर पर बनाई जाने वाली लोक देवी का भित्ति चित्र।
📢 रणघोष: फाइरे – फाइरे
🤝 विवाह एवं सामाजिक प्रथाएँ
भीलों में विवाह के विभिन्न रूप प्रचलित हैं:
- दापा करना (क्रय विवाह): वधू का मूल्य चुकाकर विवाह।
- हाथी वेडो: पवित्र वृक्षों (बांस, पीपल) के समक्ष फेरे लेना।
- भंगोरिया उत्सव: वह मेला जहाँ भील अपना जीवनसाथी चुनते हैं।
- काटा: भील जनजाति में मृत्यु भोज को ‘काटा’ कहा जाता है।
🚜 कृषि पद्धतियां
- झुनिंग कृषि: पहाड़ों पर वनों को जलाकर की जाने वाली खेती।
- वालर / दजिया: मैदानी भागों में वनों को साफ कर की जाने वाली खेती।
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